सोलह संस्कार
प्राचीन काल में हमारा प्रत्येक कार्य संस्कार से आरम्भ होता था। उस समय संस्कारों की संख्या भी लगभग चालीस थी। जैसे-जैसे समय बदलता गया तथा व्यस्तता बढती गई तो कुछ संस्कार स्वत: विलुप्त हो गये। इस प्रकार समयानुसार संशोधित होकर संस्कारों की संख्या निर्धारित होती गई। गौतम स्मृति में चालीस प्रकार के संस्कारों का उल्लेख है। महर्षि अंगिरा ने इनका अंतर्भाव पच्चीस संस्कारों में किया। व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों का वर्णन हुआ है। हमारे धर्मशास्त्रों में भी मुख्य रूप से सोलह संस्कारों की व्याख्या की गई है। इनमें पहला गर्भाधान संस्कार और मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि अंतिम संस्कार है। गर्भाधान के बाद पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण ये सभी संस्कार नवजात का दैवी जगत् से संबंध स्थापना के लिये किये जाते हैं। दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है।
“गर्भाधानं पुंसवनं सीमंतो जातकर्म च।
नामक्रियानिष्क्रमणेअन्नाशनं वपनक्रिया:।।
कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारंभक्रियाविधि:।
केशांत स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रह:।।
त्रेताग्निसंग्रहश्चेति संस्कारा: षोडश स्मृता:। ʼʼ
1. गर्भाधान
हिन्दू धर्म संस्कारों में गर्भाधान-संस्कार प्रथम संस्कार
है। यहीं से बालक का निर्माण होता है। गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के पश्चात्
दम्पति-युगल को पुत्र उत्पन्न करने के लिए मान्यता दी गयी है। इसलिये शास्त्र में
कहा गया है कि - उत्तम संतान प्राप्त करने के लिए सबसे पहले गर्भाधान-संस्कार करना
होता है। पितृ-ऋण से उऋण होने के लिए ही संतान-उत्पादनार्थ यह संस्कार किया जाता
है। इस संस्कार से बीज तथा गर्भ से सम्बन्धित मलिनता आदि दोष दूर हो जाते हैं।
जिससे उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।
निषेकाद् बैजिकं चैनो गार्भिकं
चापमृज्यते।
क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम्।।
- अर्थात् विधिपूर्वक संस्कार से युक्त गर्भाधान से अच्छी और सुयोग्य संतान उत्पन्न होती है। इस संस्कार से वीर्यसंबधी पाप का नाश होता है, दोष का मार्जन तथा क्षेत्र का संस्कार होता है। यही गर्भाधान-संस्कार का फल है।
2. पुंसवन (गर्भ के तीसरे माह तेजस्वी पुत्र
प्राप्ति हेतु किया गया संस्कार),
हिन्दू धर्म संस्कारों में पुंसवन संस्कार द्वितीय संस्कार
है। जीव जब पिता के द्वारा मातृगर्भ में आता है, तभी से उसका शारीरिक विकास होना प्रारम्भ हो
जाता है। बालक के शारीरिक विकास अनुकूलतापूर्वक हों, इसीलिए यह संस्कार किया जाता है। शास्त्र में
कहा गया है कि गर्भाधान से तीसरे महीने में पुंसवन-संस्कार किया जाता है। इस
संस्कार से गर्भ में आया हुआ जीव पुरुष बनता है। कहा भी है कि जिस कर्म से वह
गर्भस्थ जीव पुरुष बनता है, वही पुंसवन-संस्कार है। वैद्यक शास्त्र के
अनुसार चार महीने तक गर्भ का लिंग-भेद नहीं होता है। इसलिए लड़का या लड़की के
चिह्न की उत्पत्ति से पूर्व ही इस संस्कार को किया जाता है। इस संस्कार में
औषधिविशेष को गर्भवती स्त्री की नासिका के छिद्र से भीतर पहुँचाया जाता है।
सुश्रुतसंहिता के अनुसार जिस समय स्त्री ने गर्भधारण कर रखा हो,
उन्हीं दिनों में लक्ष्मणा,
वटशुंगा, सहदेवी और विश्वदेवा - इनमें से किसी एक औषधी
को गोदुग्ध के साथ खूब महीन पीसकर उसकी तीन या चार बूँदें उस स्त्री की दाहिनी
नासिका के छिद्र में डालें। इससे उसे पुत्र की प्राप्ति होगी।
श्रद्धा के साथा संकल्प किया जाए,
तो पुत्र ही उत्पन्न होता है।
पुमानग्निः
पुमानिन्द्रः पुमान् देवो बृहस्पतिः।
पुमांसं
पुत्रं विन्दस्व तं पुमान्नु जायताम्।।
- अर्थात् अग्निदेवता पुरुष हैं,
देवराज इंद्र भी पुरुष हैं तथा देवताओ के गुरु
बृहस्पति भी पुरुष है, तुझे भी पुरुषत्वयुक्त पुत्र ही उत्पन्न हो।
हिन्दू धर्म संस्कारों में तृतीय संस्कार है। यह संस्कार पुंसवन का ही विस्तार है। इसका शाब्दिक अर्थ है- "सीमन्त" अर्थात् 'केश और उन्नयन' अर्थात् 'ऊपर उठाना'। संस्कार विधि के समय पति अपनी पत्नी के केशों को संवारते हुए ऊपर की ओर उठाता था, इसलिए इस संस्कार का नाम 'सीमंतोन्नयन' पड़ गया। इस संस्कार का उद्देश्य गर्भवती स्त्री को मानसिक बल प्रदान करते हुए सकारात्मक विचारों से पूर्ण रखना था। शिशु के विकास के साथ माता के हृदय में नई-नई इच्छाएँ पैदा होती हैं। शिशु के मानसिक विकास में इन इच्छाओं की पूर्ति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अब वह सब कुछ सुनता और समझता है तथा माता के प्रत्येक सुख-दु:ख का सहभागी होता है। अतः छठे या आठवें मास में इस संस्कार को अवश्य कर लेना चाहिये।
येनादितेः सीमानं नयाति प्रजापतिर्महते सौभगाय।
तेनाहमस्यौ सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोमि।।
हिन्दू धर्म संस्कारों में जातकर्म संस्कार चतुर्थ संस्कार है। गर्भस्थ बालक के जन्म होने पर यह संस्कार किया जाता है - 'जाते जातक्रिया भवेत्।' इसमें सोने की शलाका से विषम मात्रा में घृत और मधु घिस करके बालक को चटाया जाता है। इससे माता के गर्भ में जो रस पीने का दोष है, वह दूर हो जाता है और बालक की आयु तथा मेधाशक्ति को बढ़ाने वाली औषधि बन जाती है। सुवर्ण वातदोष को दूर करता है। मूत्र को भी स्वच्छ बना देता है और रक्त के ऊर्ध्वगामी दोष को भी दूर कर देता है। मधु लाला (लार)-का संचार करता है और रक्त का शोधक होने के साथ-साथ बलपुष्टिकारक भी है।
5. नामकरण
नामकरण
संस्कार हिन्दू धर्म संस्कारों में पंचम संस्कार है। यह संस्कार बालक के जन्म होने
के ग्यारहवें दिन में कर लेना चाहिये। इसका कारण यह है कि पाराशर स्मृति के अनुसार
जन्म के सूतक में ब्राह्मण दस दिन में, क्षत्रिय बारह दिन में, वैश्य पंद्रह
दिन में और शूद्र एक मास में शुद्ध होता है। अतः अशौच बीतने पर ही नामकरण-संस्कार
करना चाहिये, क्योंकि नाम के साथ मनुष्य का घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है। नाम
प्रायः दो होते हैं- एक गुप्त नाम दूसरा प्रचलित नाम। जैसे कहा है कि- दो नाम
निश्चित करें, एक नाम नक्षत्र-सम्बन्धी हो और दूसरा नाम रुचि के अनुसार
रखा गया हो। गुप्त नाम केवल माता-पिता को छोड़कर अन्य किसी को मालूम न हो। इससे
उसके प्रति किया गया मारण, उच्चाटन तथा मोहन आदि अभिचार कर्म सफल नहीं हो पाता है।
नक्षत्र या राशियों के अनुसार नाम रखने से लाभ यह है कि इससे जन्मकुंडली बनाने में
आसानी रहती है। नाम भी बहुत सुन्दर और अर्थपूर्ण रखना चाहिये। अशुभ तथा भद्दा नाम
कदापि नहीं रखना चाहिये।
आयुर्वेडभिवृद्धिश्च
सिद्धिर्व्यवहतेस्तथा ।
नामकर्मफलं
त्वेतत् समुद्दिष्टं मनीषिभिः ।।
हिन्दू धर्म
संस्कारों में निष्क्रमण संस्कार षष्ठम संस्कार है। इसमें बालक को घर के भीतर से
बाहर निकालने को निष्क्रमण कहते हैं। इसमें बालक को सूर्य का दर्शन कराया जाता है।
बच्चे के पैदा होते ही उसे सूर्य के प्रकाश में नहीं लाना चाहिये। इससे बच्चे की
आँखों पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। इसलिये जब बालक की आँखें तथा शरीर कुछ पुष्ट बन
जाये, तब इस संस्कार को करना चाहिये।
शिवे ते स्तां
द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ। शं ते सूर्य
आ तपतुशं वातो
ते हदे। शिवा अभि क्षरन्तु त्वापो दिव्यः पयस्वतीः ।।
7. अन्नप्राशन (पांच महीने की आयु में सर्वप्रथम
अन्न ग्रहण करवाना)
हिन्दू धर्म
संस्कारों में अन्नप्राशन संस्कार सप्तम संस्कार है। इस संस्कार में बालक को अन्न
ग्रहण कराया जाता है। अब तक तो शिशु माता का दुग्धपान करके ही वृद्धि को प्राप्त
होता था, अब आगे स्वयं अन्न ग्रहण करके ही शरीर को पुष्ट करना होगा, क्योंकि
प्राकृतिक नियम सबके लिये यही है। अब बालक को परावलम्बी न रहकर धीरे-धीरे
स्वावलम्बी बनना पड़ेगा। केवल यही नहीं, आगे चलकर अपना तथा अपने परिवार के सदस्यों के
भी भरण-पोषण का दायित्व संम्भालना होगा। यही इस संस्कार का तात्पर्य है।
आहारशुद्धौ
सत्त्वशुद्धिः।
हिन्दू धर्म
संस्कारों में चूड़ाकरण (मुडंन, शिखा) संस्कार अष्टम संस्कार है। अन्नप्राशन
संस्कार करने के पश्चात् चूड़ाकरण-संस्कार करने का विधान है। यह संस्कार पहले या
तीसरे वर्ष में कर लेना चाहिये।
मनुस्मृति[1]के कथनानुसार द्विजातियों का पहले या तीसरे
वर्ष में (अथवा कुलाचार के अनुसार) मुण्डन कराना चाहिये—ऐसा वेद का
आदेश है। इसका कारण यह है कि माता के गर्भ से आये हुए सिर के बाल अर्थात् केश
अशुद्ध होते हैं। दूसरी बात वे झड़ते भी रहते हैं। जिससे शिशु के तेज़ की वृद्धि
नहीं हो पाती है। इन केशों को मुँडवाकर शिशु की शिखा (चोटी) रखी जाती है। शिखा से
आयु और तेज़ की वृद्ध होती है।
तेन ते आयुषे वपामि सुश्लोकाय स्वस्त्ये।
नि वर्त्तयाम्यायुषेड्न्नाद्याय प्रजननाय।
रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय।।
9. कर्णछेदन
हिन्दू धर्म
संस्कारों में कर्णवेध संस्कार नवम संस्कार है। यह संस्कार कर्णेन्दिय में श्रवण
शक्ति की वृद्धि, कर्ण में आभूषण पहनने तथा स्वास्थ्य रक्षा के लिये किया
जाता है। विशेषकर कन्याओं के लिये तो कर्णवेध नितान्त आवश्यक माना गया है। इसमें
दोनों कानों को वेध करके उसकी नस को ठीक रखने के लिए उसमें सुवर्ण कुण्डल धारण
कराया जाता है। इससे शारीरिक लाभ होता है।
कर्णवेध-संस्कार द्धिजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और
वैश्य) का साही के कांटे से भी करने का विधान है। शुभ समय में, पवित्र स्थान
पर बैठकर देवताओं का पूजन करने के पश्चात् सूर्य के सम्मुख बाल्क या बालिका के
कानों को निम्नलिखित मंत्र द्वारा अभिंमत्रित करना चाहिए –
भद्रं कर्णेभिः
क्षृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवां
सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः।।
इसके बाद बालक के दाहिने कान में पहले और बाएं
कान में बाद में सुई से छेद करें। उनमें कुडंल आदि पहनाएं। बालिका के पहले बाएं
कान में, फिर दाहिने कान में छेद करके तथा बाएं नाक में भी छेद करके
आभुषण पहनाने का विधान है।
हिन्दू धर्म
संस्कारों में उपनयन संस्कार दशम संस्कार है। मनुष्य जीवन के लिए यह संस्कार विशेष
महत्त्वपूर्ण है। इस संस्कार के अनन्तर ही बालक के जीवन में भौतिक तथा आध्यात्मिक
उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। इस संस्कार में वेदारम्भ-संस्कार का भी समावेश
है। इसी को यज्ञोपवीत-संस्कार भी कहते हैं। इस संस्कार में वटुक को गायत्री मंत्र
की दीक्षा दी जाती है और यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है। विशेषकर अपनी-अपनी शाखा के
अनुसार वेदाध्ययन किया जाता है। यह संस्कार ब्राह्मण बालक का आठवें वर्ष में, क्षत्रिय बालक
का ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य बालक का बारहवें वर्ष में होता है। कन्याओं को इस
संस्कार का अधिकार नहीं दिया गया है। केवल विवाह-संस्कार ही उनके लिये द्विजत्व के
रूप में परिणत करने वाला संस्कार माना गया है।
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं
पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं
बलमस्तु तेजः ।।
हिन्दू धर्म संस्कारों में केशान्त संस्कार एकादश संस्कार है। बालक का प्रथम मुंण्डन प्रायः पहले या तीसरे वर्ष में हो जाता है। यह बात पहले ही कही जा चुकी है। प्रथम मुंण्डन का प्रयोजन केवल गर्भ के केशमात्र दूर करना होता है। उसके बाद इस केशान्त संस्कार में भी मुंण्डन करना होता है। जिससे बालक वेदारम्भ तथा क्रिया-कर्मों के लिए अधिकारी बन सके अर्थात् वेद-वेदान्तों के पढ़ने तथा यज्ञादिक कार्यों में भाग ले सके। इसलिए कहा भी है कि शास्त्रोक्त विधि से भली-भाँति व्रत का आचरण करने वाला ब्रह्मचारी इस केशान्त-संस्कार में सिर के केशों को तथा श्मश्रु के बालों को कटवाता है।
श्मश्रुणामभिधानात् श्मश्रुसंस्कार एवं
केशान्तशब्देन प्रतिपाद्यते।
अत एवाश्वलायनेनापि 'श्मश्रुणीहोन्दति'।
हिन्दू धर्म
संस्कारों में समावर्तन संस्कार द्वादश संस्कार है। यह संस्कार विद्याध्ययनं पूर्ण
हो जाने पर किया जाता है। प्राचीन परम्परा में बारह वर्ष तक आचार्यकुल या गुरुकुल
में रहकर विद्याध्ययन परिसमाप्त हो जाने पर आचार्य स्वयं शिष्यों का
समावर्तन-संस्कार करते थे। उस समय वे अपने शिष्यों को गृहस्थ-सम्बन्धी श्रुतिसम्मत
कुछ आदर्शपूर्ण उपदेश देकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश के लिए प्रेरित करते थे। जिन
विद्याओं का अध्ययन करना पड़ता था, वे चारों वेद हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद
वेदान्त में शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिषशास्त्रं। उपवेद में अथर्ववेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद, आयुर्वेद आदि।
ब्राह्मणग्रन्थों में शतपथब्राह्मण, ऐतरेयब्राह्मण, ताण्ड्यब्राह्मण और गोपथब्राह्मण आदि। उपागों
में पूर्वमीमांसा, वैशेषिकशास्त्र, न्याय (तर्कशास्त्र), योगशास्त्र, सांख्यशास्त्र
और वेदान्तशास्त्र आदि।
ब्रह्मचर्यव्रत के समापन व विद्यार्थीजीवन के
अंत के सूचक के रुप में समावर्तन (उपदेश)-संस्कार किया जाता है, जो साधारणतया 25 वर्ष की आयु
में होता है। इस संस्कार के माध्यम से गुरु-शिष्य को इंद्रिय निग्रहदान, दया और
मानवकल्याण की शिक्षा देता है। ऋग्वेद में लिखा है -
युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति
जायमानः।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यों मनसा देवयन्तः।।
हिन्दू धर्म संस्कारों में 'त्रयोदश संस्कार' है। स्नातकोत्तर जीवन विवाह का समय होता है, अर्थात्
विद्याध्ययन के पश्चात् विवाह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना होता है। यह
संस्कार पितृ ऋण से उऋण होने के लिए किया जाता है। मनुष्य जन्म से ही तीन ऋणों से
बंधकर जन्म लेता है- 'देव ऋण', 'ऋषि ऋण' और 'पितृ ऋण'। इनमें से अग्रिहोत्र अर्थात यज्ञादिक कार्यों
से देव ऋण, वेदादिक शास्त्रों के अध्ययन से ऋषि ऋण और विवाहित पत्नी से
पुत्रोत्पत्ति आदि के द्वारा पितृ ऋण से उऋण हुआ जाता है।
दश पूर्वांन् परान्वंश्यान् आत्मनं चैकविंशकम्।
ब्राह्मीपुत्रः सुकृतकृन् मोचये देनसः पितृन्।।
हिन्दू धर्म संस्कारों में वानप्रस्थ संस्कार चर्तुदश संस्कार है। पुत्र का पुत्र अर्थात् पौत्र का मुख देख लेने के पश्चात् पितृ-ऋण चुक जाता है। यदि घर छोड़ने की सम्भावना न हो तो घर का दायित्व ज्येष्ठ पुत्र को सौंपकर अपने जीवन को आध्यात्मिक जीवन में परिवर्तित कर लेना चाहिये। स्वाध्याय, मनन, सत्संग, ध्यान, ज्ञान, भक्ति तथा योगदिक साधना के द्वारा अपने जीवन स्तर को ऊँचा उठाना चाहिये। इससे सन्न्यास धर्म के लिये योग्यता भी आ जाती है। वानप्रस्थ के सबंध में हारीत स्मृतिकार ने लिखा है।
एवं वनाश्रमे तिष्ठान पातयश्चैव किल्विषम् ।
चतुर्थमाश्रमं गच्छेत् सन्न्यासविधिना द्धिजः।।
महार्षिपितृदेवानां गत्वाड्ड्नृण्यं यथाविधिः।
पुत्रे सर्वं समासज्य वसेन्माध्यस्थमाश्रितः।।
15. सन्न्यास
हिन्दू धर्म संस्कारोंमें परिव्राज्य या सन्न्यास संस्कार पंचदश संस्कार है। सन्न्यास का अभिप्राय है सम्यक् प्रकार से त्याग। सन्न्यास आश्रम में प्रवेश करने के लिए भी संस्कार करना पड़ता है। इसलिये श्रुति में कहा गया है कि ब्रह्मचर्याश्रम समाप्त करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे, गृहस्थाश्रम के पश्चात् वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश करे और उसके बाद अन्तिम चौथे सन्न्यास आश्रम में प्रवेश करे, यही वैदिक मान्यता है। सन्न्यास-आश्रम में प्रवेश करके ब्रह्मविद्या का अभ्यास करना पड़ता है और ब्रह्माभ्यास के द्वारा कैवल्य-मोक्ष की प्राप्ति का उपाय करना होता है। केवल यही नहीं, पुत्रैषणा, वित्तैषणा एवं लोकैषणा आदि समस्त एषणाओं का परित्याग भी कर देना होता है। इससे मोक्षमार्ग प्रशस्त बन जाता है। जो संन्यासी आश्रम-मठों से बाहर विचरण करते हों, उनके लिए भिक्षावृत्ति से जीवन-निर्वाह करने का विधान किया गया है।
16. अन्त्येष्टि
हिन्दू धर्म
संस्कारों में षोडश संस्कार है। यह अन्तिम संस्कार है। मृत्यु के पश्चात् यह
संस्कार किया जाता है। इस संस्कार को पितृमेध, अन्त्कर्म, दाह-संस्कार, श्मशानकर्म तथा अन्त्येष्टि-क्रिया आदि भी कहते
हैं। यह संस्कार वेदमंत्रों के उच्चारण द्वारा होता है। हिन्दू धर्म में मृत्यु के
बाद दाह-संस्कार करने का विधान है। केवल संन्यासी-महात्माओं के लिए निरग्रि होने
के कारण शरीर छूट जाने पर भूमिसमाधि या जलसमाधि आदि देने का विधान है। कहीं-कहीं
संन्यासी का भी दाह-संस्कार किया जाता है और उसमें कोई दोष नहीं माना जाता है।
नदीं वैतरणीं
तर्तु दद्याद्वैतरणीं च गाम्।
कृष्णस्तनी
सकृष्णांगी सा वै वैतरणी स्मृता।।
अर्थात; यम के द्वार पर वैतरणी नाम की नदी है, जो रक्त एवं
पैने अस्त्रों से परिपूर्ण है;
जो लोग मरते समय गौदान करते हैं, वे उस नदी को गाय की पूँछ पकड़कर पार कर जाते हैं। स्कन्दपुराण जहाँ वैतरणी की
चर्चा है:-

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