BHAGVAN VISHNUKE AVTAR

भगवान विष्णु के 24 अवतार

हिंदू पौराणिक कथाओं में, भगवान को विभिन्न अनूठे तरीकों से चित्रित किया गया है, जिसमें गहरी व्याख्या और प्रतीकात्मक दुर्लभता है। जीस में ब्रह्मा Generator यानि की सर्जन करता है, भगवन विष्णु Operator यानि की पालनहार है, और Destroyer यानि की संहार करता भगवन शिव को कहा गया है | इसी त्रिदेव से हमारा संसार संतुलित है |        

श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण के द्वारा कहा गया है l

"यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

भ्युथानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे॥"

        

र्थात् जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान हो जाता है, तब-तब सज्जनों के परित्राण और दुष्टों के विनाश के लिए मैं विभिन्न युगों में (माया का आश्रय लेकर) उत्पन्न होता हूँ। इससे अन्याय और अनाचार का अंत होगा तथा न्याय का शासन होगा जिससे सत्य युग की फिर से स्थापना होगी।

भगवान विष्णु के अनगिनत अवतार हैं | श्रीमद् भागवत स्कंध १ अध्याय ३ भगवान विष्णु का सबसे महत्वपूर्ण २४ अवतारका वर्णन कियागया है | इन में से २३ अवतारा हो चुके है और अंतिम अवतार 'कल्कि' इस कलियुग मै होनेवाल है |

भगवान विष्णु के चोबीस अवतार हैं :- 1.आदि पुरुष 2.चार कुमार 3. वराह 4. नारद 5. नर-नारायण ऋषि 6. कपिल मुनि 7.दत्तात्रेय 8. यज्ञ 9. भगवान ऋषभदेव 10. पृथु राजा 11. मत्स्य 12. कूर्म     13. धन्वन्तरि 14. मोहिनी 15. नरसिंह 16. हयग्रीव 17. वामन 18.परशुराम 19. व्यास    20. राम 21. बलराम 22. कृष्ण 23. बुद्ध 24. कल्कि

आइये जानते है भगवन विष्णु के २४ अवतार के बारे में

1. आदि पुरुष



आदि पुरुष सृष्टि आरंभ करने की आकांक्षा वाले एक प्रमुख पुरुष के रूप में विष्णु के पहले अवतार हैं। भगवान विष्णु को शेषनाग के घुंघरुओं पर आराम करते हुए चित्रित किया गया है। वह सृष्टि की रचना के अधिकारी है। जब भगवान विष्णु गहन ध्यान (योग निद्रा) की स्थिति में होते हैं, तो महाशक्ति, भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु की नाभि से प्रकट होते हैं। ब्रह्मा कमल के अंकुर पर निवास करते हैं और ब्रह्मांड का निर्माण करते है, साथ ही सृष्टि का विस्तार, भगवान ब्रह्मा के अंगों से शुरू होता है। यह पहला अवतार सर्वोच्च शक्ति है, जो केवल उन योगियों और ऋषियों को दिखाई देती है जिन्होंने परम दिव्य ज्ञान प्राप्त कर लिया है। आदि-पुरुष वह अमर बीज है जो भगवान विष्णु के अन्य सभी अवतारों को प्रकट करता है। दुनिया के अंतिम विनाश के बिंदु पर प्रत्येक रचना एकता के रूप में उसमें  समां जाएगी । 

2. चार कुमार



        सनक, सनन्दन, सनातन और सनत कुमार नामक चार कुमार चार योगी हैं, जो पहले चार संवेदनशील प्राणी थे जिन्हें भगवान ब्रह्मा ने उत्पन्न किया था। वे बच्चों के रूप में अवतरित हुए थे | और उन्हें अस्तित्व के निर्माण में ब्रह्मा की सहायता के इरादे से बनाया गया था। जब कुमार उत्पन्न हुए, तो वे सद्गुणों के अवतार और परिपूर्ण थे, जिनमें आलस्य या क्रोध जैसे विरोधी तत्वों का कोई स्थान व संकेत नहीं था। ब्रह्मा ने सभ्यता को बढ़ाने के उद्देश्य से उनके पुत्रों को उत्पन्न किया। फिर भी चारों कुमारों ने ब्रह्मा को सांसारिक संबंधों में शामिल होने से मना कर दिया। इस प्रकार, चारों कुमार सदैव अविवाहित ऋषि बने रहे और भगवान की स्तुति का उपदेश देते रहे। 

3. वराह

        

        वराह अवतार आधे सूअर और आधे मनुष्य के रूप में है। भगवान विष्णु के इस अवतार का उल्लेख उन किंवदंतियों में किया गया है जहां उन्हें पृथ्वी को ब्रह्मांड महासागर से बाहर निकालने से जोड़ा गया है। हिंदू धर्म के अनुसार, जब राक्षस हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को नष्ट कर दिया और उसे आकाशीय जल में छिपा दिया, तो भगवान विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध करके भूदेवी को पुनः प्राप्त करने के लिए रक्षक के रूप में वराह के रूप में अवतार लिया। उन्होंने अपने दाँत से पृथ्वी को डूबने से बचाया और उसे उसके स्थान पर पुनर्जीवित कर दिया।


4. नारद


        नारद एक असाधारण हिंदू ऋषि हैं जो देवताओं और मनुष्यों दोनों के बीच प्रसिद्ध हैं। नारद मुनि के रूप में लोकप्रिय, उनका उल्लेख रामायण और भागवत पुराण जैसे कई हिंदू पवित्र ग्रंथों में महत्वपूर्ण रूप से किया गया है। नारद को भगवान ब्रह्मा का वंशज और भगवान विष्णु का एक भावुक शिष्य भी माना जाता है, जो हमेशा 'नारायण' और 'हरि' नामों का जप करते हैं जो भगवान विष्णु के प्रमुख नाम हैं। अपने हाथों में खड़ताल और तंबूरा के साथ, उनके पास अवधियों में लोगों के बीच यात्रा करने की अद्वितीय क्षमता है। वह एक कहानीकार और संगीतकार, देवताओं के दूत और स्वर्ग के पत्रकार हैं। उन्हें सभी संतों में सबसे बुद्धिमान माना जाता है |

5. नर-नारायण ऋषि 


        पृथ्वी पर भगवान विष्णु का अगला अवतार जहां जुड़वां भाई नर-नारायण ऋषि थे। नारा मानव आत्मा है जो नारायण का स्थायी समकक्ष है, जो कि दिव्य है। उनके अवतार का उद्देश्य पृथ्वी पर सत्यता उदारता न्याय और धर्म के अन्य सभी गुणों की रक्षा करना था। हिंदुओं का मानना ​​है कि नर-नारायण ऋषि बद्रीनाथ में रहते हैं, वह स्थान जहां नर-नारायण के अधिकांश मंदिर हैं।

 6. कपिल मुनि



        कपिल मुनि 'सांख्य दर्शन' के प्रवर्तक थे, जिन्हें भगवान विष्णु का पंचम अवतार माना जाता है। इनकी माता का नाम देवहूति व पिता का नाम कर्दम था। कपिल मुनि की माता देवहूति ने विष्णु के समान पुत्र की कामना की थी। अतः भगवान विष्णु ने स्वयं उनके गर्भ से जन्म लिया था। कर्दम जब संन्यास लेकर वन जाने लगे तो देवहूति ने कहा, "स्वामी मेरा क्या होगा?" इस पर ऋषि कर्दम ने कहा कि "तेरा पुत्र ही तुझे ज्ञान देगा।" समय आने पर कपिल ने माता को जो ज्ञान दिया, वह 'सांख्य दर्शन' कहलाया।

7.दत्तात्रेय



        ऋषि के रूप में भगवान विष्णु का एक और अवतार, जिसका नाम दत्तात्रेय है, योग के भगवान हैं। उन्हें त्रिमूर्ति के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि उन्हें तीन सिर वाले आदर्श भिक्षु के रूप में दर्शाया गया है। प्रत्येक सिर पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव को छह हाथों से दर्शाया गया है, और प्रत्येक जोड़ी में चित्रात्मक वस्तुएं हैं जो मुख्य रूप से तीनों देवताओं में से प्रत्येक के लिए जिम्मेदार हैं। वे ब्रह्मा का जलपात्र और माला, विष्णु का चर्चा और शंख, शिव का डमरू और त्रिशूल हैं। इस प्रकार दत्तात्रेय तीन हिंदू देवताओं की सामूहिक प्रस्तुति हैं। दत्तात्रेय शीघ्र कृपा करने वाले देव की साक्षात मूर्ति कहे जाते हैं। अत्रि ऋषि की पत्नि माता अनुसूया पर प्रसन्न होकर तीनों देवों- ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने उन्हें वरदान दिया। ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा तथा विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ। इन्हीं के आविर्भाव की तिथि 'दत्तात्रेय जयंती' कहलाती है। परम भक्त वत्सल दत्तात्रेय, भक्त के स्मरण करते ही उसके पास पहुँच जाते हैं। इसीलिए इन्हें 'स्मृतिगामी' तथा 'स्मृतिमात्रानुगन्ता' भी कहा गया है। ये विद्या के परम आचार्य हैं। भगवान दत्तजी के नाम पर 'दत्त संप्रदाय' दक्षिण भारत में विशेष प्रसिद्ध है।


8. यज्ञ



        भागवत पुराण में यज्ञ को भगवान विष्णु का अवतार कहा गया है। यज्ञ का अर्थ है बलिदान का एक अनुष्ठान जहां अग्नि से देवी-देवताओं को प्रसन्न करके मनोवांछित फल की प्राप्ति की जाती है | भगवान विष्णु अनुष्ठान के अवतार है और कुछ ग्रंथों में देवताओं के राजा इंद्र का भी उल्लेख यज्ञ के रूप में किया गया है। यह विष्णु के मुख्य चौबीस अवतारों में से सबसे महत्वपूर्ण अवतार है।

9. भगवान ऋषभदेव


            भगवान ऋषभदेव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है- 'जो तीर्थ की रचना करें। जो संसार सागर (जन्म मरण के चक्र) से मोक्ष तक के तीर्थ की रचना करें। ऋषभदेव को 'आदिनाथ' भी कहा जाता है। भगवान ऋषभदेव वर्तमान अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर हैं। महाराज नाभि के पुत्र का नाम ऋषभ था। जैन धर्म भगवान ऋषभ को प्रथम तीर्थंकर मानता है। उन्हीं के आचार की व्याख्या पीछे के जैनाचार्यों ने की है |

10. पृथु राजा

पृथु राजा वेन के पुत्र थे। भूमण्डल पर सर्वप्रथम सर्वांगीण रूप से राजशासन स्थापित करने के कारण उन्हें पृथ्वी का प्रथम राजा माना गया है। साधुशीलवान् अंग के दुष्ट पुत्र वेन को तंग आकर ऋषियों ने हुंकार-ध्वनि से मार डाला था। तब अराजकता के निवारण हेतु निःसन्तान मरे वेन की भुजाओं का मन्थन किया गया जिससे स्त्री-पुरुष का एक जोड़ा प्रकट हुआ। पुरुष का नाम 'पृथु' रखा गया तथा स्त्री का नाम 'अर्चि'। वे दोनों पति-पत्नी हुए। पृथु को भगवान् विष्णु तथा अर्चि को लक्ष्मी का अंशावतार माना गया है। महाराज पृथु ने ही पृथ्वी को समतल किया जिससे वह उपज के योग्य हो पायी। 

महाराज पृथु से पहले इस पृथ्वी पर पुर-ग्रामादि का विभाजन नहीं था; लोग अपनी सुविधा के अनुसार बेखटके जहाँ-तहाँ बस जाते थे। महाराज पृथु अत्यन्त लोकहितकारी थे। उन्होंने 99 अश्वमेध यज्ञ किये थे। सौवें यज्ञ के समय इन्द्र ने अनेक वेश धारण कर अनेक बार घोड़ा चुराया, परन्तु महाराज पृथु के पुत्र इन्द्र को भगाकर घोड़ा ले आते थे। इन्द्र के बारंबार कुकृत्य से महाराज पृथु अत्यन्त क्रोधित होकर उन्हें मार ही डालना चाहते थे कि यज्ञ के ऋत्विजों ने उनकी यज्ञ-दीक्षा के कारण उन्हें रोका तथा मन्त्र-बल से इन्द्र को अग्नि में हवन कर देने की बात कही, परन्तु ब्रह्मा जी के समझाने से पृथु मान गये और यज्ञ को रोक दिया। सभी देवताओं के साथ स्वयं भगवान् विष्णु भी पृथु से परम प्रसन्न थे।

11. मत्स्य


        मत्स्य अवतार भगवान विष्णु के प्रथम अवतार है। मछली के रूप में अवतार लेकर भगवान विष्णु ने एक ऋषि को सब प्रकार के जीव-जन्तु एकत्रित करने के लिये कहा और पृथ्वी जब जल में डूब रही थी, तब मत्स्य अवतार में भगवान ने उस ऋषि की नाव की रक्षा की। इसके पश्चात ब्रह्मा ने पुनः जीवन का निर्माण किया। एक दूसरी मन्यता के अनुसार एक राक्षस ने जब वेदों को चुरा कर सागर की अथाह गहराई में छुपा दिया, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों को प्राप्त किया और उन्हें पुनः स्थापित किया।

12. कूर्म 


        कूर्म अवतार को 'कच्छप अवतार' (कछुआ अवतार) भी कहते हैं। कूर्म अवतार में भगवान विष्णु ने क्षीरसागर के समुद्र मंथन के समय मंदर पर्वत को अपने कवच पर संभाला था। इस प्रकार भगवान विष्णु, मंदर पर्वत और वासुकी नामक सर्प की सहायता से देवों एवं असुरों ने समुद्र मंथन करके चौदह रत्नों की प्राप्ति की। इस समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप भी धारण किया था। 

 13. धन्वन्तरि 


        धन्वन्तरि हिन्दू धर्म में मान्य देवताओं में से एक हैं। भगवान धन्वन्तरि आयुर्वेद जगत् के प्रणेता तथा वैद्यक शास्त्र के देवता माने जाते हैं। भारतीय पौराणिक दृष्टि से 'धनतेरस' को स्वास्थ्य के देवता धन्वन्तरि का दिवस माना जाता है। धन्वन्तरि आरोग्य, सेहत, आयु और तेज के आराध्य देवता हैं। धनतेरस के दिन उनसे प्रार्थना की जाती है कि वे समस्त जगत् को निरोग कर मानव समाज को दीर्घायु प्रदान करें।

14. मोहिनी

      

        मोहिनी हिन्दू भगवान विष्णु का एकमात्र स्त्री अवतार है। इसमें उन्हें ऐसे स्त्री रूप में दिखाया गया है जो सभी को मोहित कर ले। उसके मोह में वशीभूत होकर कोई भी सब भूल जाता है, इस अवतार का उल्लेख महाभारत में भी आता है। समुद्र मंथन के समय जब देवताओं व असुरों को सागर से अमृत मिल चुका थातब देवताओं को यह डर था कि असुर कहीं अमृत पीकर अमर न हो जायें। तब वे भगवान विष्णु के पासगये व प्रार्थना की कि ऐसा होने से रोकें। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर अमृत देवताओं को पिलाया व असुरों को मोहित कर अमर होने से रोका।

15. नरसिंह 

        
        नरसिंह अथवा नृसिंह (मानव रूपी सिंह) को पुराणों में भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। जो आधे मानव एवं आधे सिंह के रूप में प्रकट होते हैं, जिनका सिर एवं धड तो मानव का था लेकिन चेहरा एवं पंजे सिंह की तरह थे । वे भारत में, खासकर दक्षिण भारत में वैष्णव संप्रदाय के लोगों द्वारा एक देवता के रूप में पूजे जाते हैं जो विपत्ति के समय अपने भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं।

नरसिंह मंत्र - ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥

16. हयग्रीव 

        हयग्रीव भगवान विष्णु के चोवीस अवतारों में से एक थे। इनका सिर घोड़े का और शरीर मनुष्य का था। वेद, जिन्हें मधु और कैटभ नाम के दैत्य उठा ले गये थे, उनके उद्धार के लिए विष्णु ने यह अवतार लिया था। पौराणिक कथा हयग्रीव की कथा महाभारत शान्ति पर्व के अनुसार यह है कल्पान्त में जब यह पृथ्वी जलमग्न हो गयी तब विष्णु को पुन: जगत सर्जन का विचार हुआ। वह जगत की विविध विचित्र रचना का विषय सोचते हुए योगनिद्रा का अवलम्बन कर जल में सो रहे थे। कुछ समय के पश्चात् भगवान ने कमल मध्य दो जलबिन्दु देखे। एक बिन्दु से मधु और दूसरे से कैटभ की उत्पत्ति हुई। उत्पन्न होते ही दैत्यों ने कमल के मध्य ब्रह्मा को देखा। दोनों सनातन वेदों को ले रसातल में चले गये। वेदों का अपहरण होने पर ब्रह्मा चिन्तित हुए कि वेद ही मेरे चक्षु है उनके अभाव में लोकसृष्टि मैं कैसे कर सकूँगा। उन्होंने वेदोउद्धार के लिए भगवान विष्णु की स्तुति की। स्तुति सुन भगवान ने हयग्रीव की मूर्ति धारण कर वेदों का उद्धार किया।

17. वामन 


वामन अवतार हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों में से पांचवें अवतार हैं जो भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की द्वादशी को अवतरित हुए। 

वामन अवतार की कथा- भागवत पुराण के अनुसार भगवान विष्णु ने देवराज इंद्र को स्वर्ग पर पुनः अधिकार प्रदान करने के लिए वामन अवतार लिया। ऋषि कश्यप और देव माता अदिति के पुत्र के रूप में भगवान विष्णु ने एक बौने ब्राह्मण के रूप में जन्म लिया। इन्हें ही वामन अवतार के नाम से जाना जाता है, ये विष्णु जी का  मुख्य दशावतार में से पांचवा अवतार थे।

18.परशुराम

        परशुराम भगवान विष्णु के एक और अवतार हैं, जो चिरंजीवियों में से एक हैं, एक ब्राह्मण हैं। भगवान विष्णु के इस अवतार का जन्म दुष्ट क्षत्रिय वर्ग की निरंकुशता को सत्रह बार नष्ट करने के उद्देश्य से हुआ था। भारतीय महाकाव्य महाभारत से, परशुराम भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण के गुरु हैं। यह भी कहा जाता है कि कलयुग के अंत में परशुराम विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि के गुरु के रूप में प्रकट होंगे।

 19. व्यास

        भारतीय महाकाव्य महाभारत के प्रसिद्ध लेखक वेदव्यास को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। वह  वेदों और पुराणों के लेखक और संकलनकर्ता भी हैं। वह चिरंजीवियों या ज्ञात अमर ऋषियों में से एक हैं। इसके अलावा व्यास ने खुद को महाकाव्य महाभारत में एक बहुत ही महत्वपूर्ण पात्र, पांडु और धृतराष्ट्र के पिता के रूप में प्रस्तुत किया।

20. राम

        भगवान विष्णु के इस अवतार से हम सभी परिचित हैं। सबसे शक्तिशाली अवतार जिसने राक्षस रावण को मारने और अपनी पत्नी सीता को बचाने के लिए लंका तक पहुँचने के लिए समुद्र पर एक पुल का निर्माण किया।

 21. बलराम

        बलराम 'नारायणी पाख्यान' में वर्णित व्यूह सिद्धान्त के अनुसार विष्णु के चार रूपों में दूसरा रूप 'संकर्षण' है। संकर्षण बलराम का अन्य नाम है, जो कृष्ण के भाई थे। सामान्यतया बलराम शेषनाग के अवतार माने जाते हैं और कहीं-कहीं विष्णु के अवतारों में भी उनकी गणना है। जब कंस ने देवकी-वसुदेव के छ: पुत्रों को मार डाला, तब देवकी के गर्भ में भगवान बलराम पधारे। योगमाया ने उन्हें आकर्षित करके नन्द बाबा के यहाँ निवास कर रही श्री रोहिणी जी के गर्भ में पहुँचा दिया। इसलिए उनका एक नाम संकर्षण पड़ा। बलवानों में श्रेष्ठ होने के कारण उन्हें बलभद्र भी कहा जाता है। बलराम जी साक्षात शेष अवतार थे। बलराम जी बचपन से ही अत्यंत गंभीर और शान्त थे। श्री कृष्ण उनका विशेष सम्मान करते थे। बलराम जी भी श्रीकृष्ण की इच्छा का सदैव ध्यान रखते थे |

22. कृष्ण

           श्रीकृष्ण को हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहरा पवित्र और समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देवता हैं। श्रीकृष्ण साधारण व्यक्ति न होकर 'युग पुरुष' थे। उनके व्यक्तित्व में भारत को एक प्रतिभा सम्पन्न 'राजनीति वेत्ता' ही नहीं, एक महान 'कर्मयोगी' और 'दार्शनिक' प्राप्त हुआ, जिसका 'गीता' ज्ञान समस्त मानव-जाति एवं सभी देश-काल के लिए पथ-प्रदर्शक है। कृष्ण की स्तुति लगभग सारे भारत में किसी न किसी रूप में की जाती है। वे लोग जिन्हें हम साधारण रूप में नास्तिक या धर्मनिरपेक्ष की श्रेणी में रखते हैं, निश्चित रूप से 'श्रीमद् भगवद्गीता' से प्रभावित हैं। 'गीता' किसने और किस काल में कही या लिखी यह शोध का विषय है, किन्तु 'गीता' को कृष्ण से ही जोड़ा जाता है। यह आस्था का प्रश्न है और यूँ भी आस्था के प्रश्नों के उत्तर इतिहास में नहीं तलाशे जाते।

23. बुद्ध

        बुद्ध को 'गौतम बुद्ध', 'महात्मा बुद्ध' आदि नामों से भी जाना जाता है। वे संसार प्रसिद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक माने जाते हैं। बौद्ध धर्म भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है। आज बौद्ध धर्म सारे संसार के चार बड़े धर्मों में से एक है। इसके अनुयायियों की संख्या दिन-प्रतिदिन आज भी बढ़ रही है। इस धर्म के संस्थापक बुद्ध राजा शुद्धोधन के पुत्र थे और इनका जन्म स्थान लुम्बिनी नामक ग्राम था। वे छठवीं से पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जीवित थे। उनके गुजरने के बाद अगली पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैल गया और अगले दो हज़ार सालों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फैल गया। आज बौद्ध धर्म में तीन मुख्य सम्प्रदाय हैं- 'थेरवाद', 'महायान' और 'वज्रयान'। बौद्ध धर्म को पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं और यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म है।

24. कल्कि

        कल्कि अवतार को विष्णु का भावी और अंतिम अवतार माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार पृथ्वी पर पाप की सीमा पार होने लगेगी, तब दुष्टों के संहार के लिए विष्णु का यह अवतार प्रकट होगा। अपने माता-पिता की पांचवीं संतान कल्कि यथासमय देवदत्त नाम के घोड़े पर आरूढ़ होकर तलवार से दुष्टों का संहार करेंगे। तब सतयुग का प्रारंभ होगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 




















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